
दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं—भारत और चीन—अब “बेहतर वैश्विक शासन” (Better Global Governance) की दिशा में मिलकर नई भूमिका निभाने की कोशिश में हैं। दोनों देश बहुध्रुवीय (Multipolar) विश्व व्यवस्था की वकालत कर रहे हैं, जहाँ शक्ति और निर्णय-निर्माण कुछ गिने-चुने देशों के हाथ में न रहकर समान रूप से बाँटा जाए।हाल ही में बीजिंग में आयोजित Xiangshan Forum और भारत की नई विदेश नीति घोषणाओं के बाद, यह साफ हो गया है कि एशिया की दो दिग्गज शक्तियाँ वैश्विक नियम-निर्माण प्रक्रिया में अपनी जगह मजबूत करना चाहती हैं।चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में स्पष्ट किया कि वैश्विक शासन को “अधिक न्यायसंगत और संतुलित” बनाया जाना चाहिए।उन्होंने कहा कि कुछ पश्चिमी देशों द्वारा थोपे गए नियमों के बजाय अब विकासशील देशों की आवाज़ भी सुनी जानी चाहिए। चीन ने अपने Global Governance Initiative (GGI) के तहत ‘लोग-केंद्रित नीतियों’ और ‘संप्रभुता के सम्मान’ पर जोर दिया है।साथ ही, चीन के प्रधानमंत्री ली कियांग ने “वैश्विक एआई सहयोग संगठन” (Global AI Cooperation Organisation) की स्थापना का प्रस्ताव रखा है, जिससे तकनीकी शासन में भी एशियाई देशों की भूमिका बढ़े।भारत ने चीन की इस पहल को लेकर सावधानीपूर्वक समर्थन जताया है। नई दिल्ली का रुख यह है कि कोई भी वैश्विक शासन ढांचा तभी स्वीकार्य होगा जब उसमें पारदर्शिता, समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन हो।भारत BRICS, AIIB और G20 जैसे मंचों के जरिये पहले से ही बहुपक्षीय प्रणाली को सशक्त करने में जुटा है। विदेश मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, भारत “अपने हितों की रक्षा करते हुए वैश्विक सुधारों का समर्थक रहेगा।”