
रायपुर।छत्तीसगढ़ के गठन को आज 25 साल पूरे होने को जा रहा हैं। लेकिन राज्य के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी के चयन और शपथ से जुड़ी कहानियां आज भी उतनी ही रोचक हैं। कांग्रेस के भीतर उस वक्त जबरदस्त खींचतान हुई थी जब कई नेताओं के बीच आखिरकार दिल्ली दरबार ने जोगी पर भरोसा जताया था। यह फैसला इतना विवादित था कि शपथ समारोह तक में तनातनी देखने को मिली थी।अजीत जोगी, कांग्रेस हाईकमान, सोनिया गांधी, दिग्विजय सिंह, विद्याचरण शुक्ल, श्यामाचरण शुक्ल, मोतीलाल वोरा, चरणदास महंत और रेणु जोगी जैसे नाम उस दौर की राजनीति में मुख्य किरदार थे । कांग्रेस के भीतर इन सभी नेताओं की अपनी-अपनी लॉबी थी, लेकिन सोनिया गांधी ने आखिरकार अजीत जोगी को चुना थानए राज्य छत्तीसगढ़ के गठन के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए कांग्रेस में घमासान मच गया था। कई वरिष्ठ नेता अपने-अपने समर्थकों के साथ दिल्ली तक पहुंच गए थे वहीं दिल्ली में सोनिया गांधी ने अंतिम फैसला लिया था ।31 अक्टूबर 2000 को अजीत जोगी को पहला मुख्यमंत्री बनाए जाने की घोषणा हुई। इसके बाद कई नेताओं ने विरोध जताया था कि शपथ-ग्रहण समारोह में जोगी की पत्नी रेणु जोगी को मंच तक जाने से भी रोक दिया गया था।यह पूरी घटनाक्रम दिल्ली और रायपुर दोनों जगह हुई थी दिल्ली में मुख्यमंत्री के नाम पर मुहर लगी थी जबकि रायपुर में शपथ समारोह के दौरान सियासी ड्रामा हुआ था छत्तीसगढ़ राज्य का गठन 1 नवंबर 2000 को हुआ था और इसी दिन अजीत जोगी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लिए थे इससे ठीक एक दिन पहले यानी 31 अक्टूबर की रात तक नए सीएम के नाम को लेकर दिल्ली में बैठक चली थीकांग्रेस हाईकमान ने अजीत जोगी को इसलिए चुना थे क्योंकि वे आदिवासी मूल के IAS पृष्ठभूमि वाले नेता थे, जिन पर सोनिया गांधी को भरोसा था।राज्य के पहले मुख्यमंत्री के रूप में एक “संतुलित चेहरा” देने की रणनीति थी। जबकि अन्य दावेदार पुराने कांग्रेसी खेमों के प्रतिनिधि माने जाते थेअजीत जोगी का नाम फाइनल होने के बाद विरोध इतना बढ़ गया था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को दिल्ली से रायपुर पहुंचकर हालात को संभालना पड़ा था वही जोगी और दिग्विजय के बीच तीखी बहस भी हुई थी।सोनिया गांधी ने बाद में दोनों को बुलाकर “बातचीत की और सख्त लहजे में कहा था— “अब फैसला हो चुका है, सबको साथ लेकर चलना होगा।”